राजस्थान के एक छोटे से गाँव में पले-बढ़े हेमंत पारीक की कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और आत्मबल की है। उनकी माँ रोज़ खेतों और ईंट-भट्ठों पर मज़दूरी करती थीं। तय मजदूरी 200 रुपये थी, लेकिन अक्सर उन्हें 60 या 80 रुपये थमा दिए जाते। यह अन्याय वे सहती रहीं, क्योंकि परिवार की मजबूर थी ।
एक दिन माँ ने यह पीड़ा हेमंत से बाँटी। माँ की लाचारी ने बेटे के दिल में चिंगारी जला दी। जब वह मज़दूरी रोकने वाले ठेकेदार से जवाब मांगने पहुँचे तो ताना मिला–
“तू कहीं का कलेक्टर है क्या?”
यही वाक्य हेमंत की ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया। वह ताना उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचा गया, लेकिन साथ ही उनकी मंज़िल भी तय कर गया। अब वे केवल नौकरी खोजने के सपने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि ठान लिया कि कलेक्टर ही बनेंगे।
गाँव से दिल्ली तक का सफर आसान नहीं था। न पैसे थे, न साधन। लेकिन जहाँ हौसले बुलंद हों, वहाँ राहें खुद बनती हैं। किसी ने उन्हें रहने का कमरा दिया, किसी ने किताबें और कोचिंग की मदद की। जैसे पूरी दुनिया उनकी लगन के आगे सिर झुका रही थी।
दिन-रात पढ़ाई, आत्मअनुशासन और संघर्ष का नतीजा यह हुआ कि यूपीएससी 2023 में हेमंत ने 884वीं रैंक हासिल की और अपने सपनों को हकीकत में बदल दिया।
हेमंत की यात्रा यह सिखाती है कि जब मन में दृढ़ निश्चय हो, तो हालात दुश्मन नहीं बनते, बल्कि सीढ़ी बन जाते हैं। उनके जीवन का सबक यही है कि ठान लो, तो कोई भी ताना आपकी जीत की प्रस्तावना बन सकता है।

