डेस्क : कहते हैं कला की कोई जाति, कोई धर्म और कोई उम्र नहीं होती और 84 वर्षीय इश्तियाक़ अली इस कहावत को अपने जीवन से सच साबित करते हैं। लखनऊ की गलियों में सड़क किनारे बैठकर चाकू और छेनी से मूर्तियां तराशते इश्तियाक़ चाचा आज भी पूरे जोश और समर्पण से अपनी कला को ज़िंदा रखे हुए हैं।

आज़ादी से पहले जन्मे इश्तियाक़ अली ने अपने जीवन के 80 साल मेहनत, संघर्ष और कला को समर्पित किए हैं। कभी बंदर-भालू का खेल दिखाकर, कभी बढ़ईगिरी और कभी गाड़ियां साफ़ करके उन्होंने अपने परिवार का पेट पाला। लेकिन उनका असली जुनून रहा — लकड़ी पर कलाकारी।

मदार की लकड़ी हो या अशोक के पेड़ की सूखी डाल, इश्तियाक़ चाचा के हाथों में वह कारीगरी का जादू है जो बेजान लकड़ी को भगवान शिव, गणेश और बजरंगबली की जीवंत प्रतिमाओं में बदल देता है। उनकी बनाई हर मूर्ति सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि एकता, परिश्रम और श्रद्धा का प्रतीक है।

इश्तियाक़ अली जैसे कलाकार भारत की उस आत्मा का प्रतीक हैं जो हर धर्म, हर सीमा से परे केवल कर्म और सृजन को पूजती है।
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आइए, इस दिवाली उनकी कला और जीवन की रौशनी को और फैलाएं।